नव वर्ष 2022 – योग से व्यक्ति और राष्ट्र के नवनिर्माण का मार्ग ..व्यक्ति अपना जीवन योगमय तभी बना सकता है जब उसके प्रत्येक कार्य में पवित्रता और सात्त्विकता हो- योग गुरु महेश अग्रवाल

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भोपाल 01 जनवरी 2022:- आदर्श योग आध्यात्मिक केन्द्र स्वर्ण जयंती पार्क कोलार रोड़ भोपाल के योग गुरु महेश अग्रवाल ने नये साल 2022 की शुरुआत सुबह 4:30 बजे ऑनलाइन योग कक्षा के माध्यम से ॐ के उच्चारण के साथ करते हुए सभी स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करें एवं जीवन में उन्नति प्राप्त करें ऐसी प्रार्थना के साथ की |

योग गुरु अग्रवाल ने कहा कि संसार में प्रत्येक प्राणी अपनी बुद्धि परिस्थिति और शक्ति के अनुसार आशा-आकांक्षा रखता है और इसी को अनुलक्ष्य बनाकर जीवन व्यतीत करता है। जीवन में कोई लक्ष्य नहीं है, यह मिथ्या है। जब तक इस शरीर में आशा है तब तक आशा और आकांक्षा का लक्ष्य है, परन्तु इस सत्य को कितने लोग आज जानते हैं? आज सांसारिक जीवन में संघर्ष और अशान्ति फैली हुई है। किसलिये? कारण यही है कि हम आनन्द और शान्तिदायक लक्ष्य से बहुत दूर हैं। आज भी पूर्व जन्मों के अनुसार पशु संस्कार हमारे मानस पटल से पूर्णरूपेण दूर नहीं हुए हैं। हमें उसे दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये। यही जीवन का वेदान्त है। वेदान्त का श्रीगणेश भी यहीं से होता है। प्रत्येक व्यक्ति को विशाल दृष्टि एवं उदात्त भावना रखनी चाहिये।आज विश्व में अशान्ति का तूफान मच रहा है। एक प्रान्त दूसरे प्रान्त पर अधिकार करने के लिये व्याकुल है। एक देश दूसरे देश को हड़पने के लिये कूद रहा है। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को खतम करने के लिये अवसर ढूँढ रहा है। बताओ क्या यही हृदय की विशालता और मन की उदारता है? क्या विश्व को आज ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता है जो समस्त संसार को अपने रंग में रंगना चाहे? आज इस धर्माचार की दुनिया को परवाह नहीं है जो जबर्दस्ती अपने मत एवं सिद्धान्तों को दूसरों से कबूल करवाता हो। अतः हमें योग द्वारा जीवन का परिमार्जन करना होगा, समाज और राष्ट्र की सूरत बदलनी होगी, तभी राष्ट्र परस्पर दृढ़ मैत्री में बँधेगे। राष्ट्र की आज की परिस्थिति के लिये वे ही व्यक्ति जवाबदेह हैं जो अपने हाथों से अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारते हैं। आज राष्ट्र को धार्मिक अनुशासन की आवश्यकता है।

धार्मिक अनुशासन का अर्थ क्या है? मुसलमानों को मुसलमान रहने दो, खिस्ती की खिस्ती दुनिया में हजार धर्म नहीं हैं। धर्म तो एक ही है। केवल मार्ग विभिन्न हैं। प्रत्येक राष्ट्र को जीवन का सच्चा अर्थ जानना आवश्यक है। धर्म को जीवन में चरितार्थ करना है। आत्म शुद्धि, परितुष्टि और आत्म- सयंम से धर्म जीवन में चरितार्थ हो सकता है। मुसलमान को सच्चा मुसलमान बनाने का प्रयत्न करो। हिन्दू को सच्चा हिन्दू बनाने का प्रयत्न करो। अपने धर्म का सच्चा अनुयायी मनुष्य तभी हो सकता है जब वह सच्चा मानव बने। हम स्वयं भले बनें, साथ ही दूसरे को बनायें। यही विश्व शान्ति का मार्ग है।

देश के नव-निर्माण के लिये आज ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता जिनने प्रलोभनों को ठुकरा दिया हो। ऐसे ही व्यक्तियों ने जीवन में योग का शुभारम्भ किया है। उनके हाथों में राष्ट्र अवश्य सुरक्षित है। वर्तमान हिंसात्मक प्रवृत्तियों में लिप्त राष्ट्र के कर्णाधार यहाँ इतना समझ लें कि जो अब भयंकर हिंसा कर सकते हैं, वे ही हाथ रक्षा भी कर सकते हैं। देश, शान्ति, समृद्धि और सुख का भार जिनके सिर पर है, वे यदि अपने को योगमय बना दें तो जीवन की सफलता शत-प्रतिशत निश्चित है।व्यक्ति अपना जीवन योगमय तभी बना सकता है जब उसके प्रत्येक कार्य में पवित्रता और सात्त्विकता हो। जीवन संघर्ष में और जीवन की परीक्षाओं में वे ही सफलता प्राप्त करते हैं। गृहस्थ जीवन में हमें योग धारण करना बहुत ही दुष्कर मालूम होता है। शिक्षक के धंधे में तो ठीक है, पर अधिवक्ता, पुलिस, प्रोफेसर आदि को पल-प्रतिपल असत्य को सत्य सिद्ध करना पड़ता है। कार्य सिद्धि के लिये छल-कपट? परन्तु जीवन सिद्धि को मापने का माप दण्ड भी सत्य ही है।ऐसा सोचना भी मूर्खता है कि योग तो तीन आश्रम-संन्यासी, विरक्तों एवं उदासियों के लिये ही है। योग का अर्थ क्या है? राजयोग, ज्ञानयोग, हठयोग? नहीं, ‘योगः कर्मसु कौशलम्’। जो भी कार्य हमारे हाथ में हो, उसे कुशलतापूर्वक पूरा करना, अर्थात् जीवन के जिस योग में भी हो, उसे कुशलतापूर्वक पूरा करना। उस कर्तव्य का पूर्ण पालन हम तभी कर सकते हैं जब हम जान लें कि प्रत्येक व्यक्ति का कार्य दो भागों में बँटा रहता है। एक स्वजाति के प्रति और दूसरा समाज के प्रति। समाज सेवा करते हुए कई व्यक्ति-दल दृष्टिगोचर होते हैं जो प्यासे को पानी, भूखे को रोटी, अनाथों को सहारा और निःसहाय को दान देते हैं। इस पर भी इनका व्यक्तिगत चरित्र खराब रहता है। ऐसे व्यक्ति समाजोपयोगी रहते हुए भी समाजोद्धारक नहीं होते। दूसरे प्रकार के व्यक्ति वे हैं, जिनका समाज से किसी भी तरह का सम्बन्ध नहीं रहता, परन्तु वे अत्यन्त उच्च चरित्रवान् होते हैं। इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों में से कोई कर्तव्य पालन नहीं करता। कर्तव्य पालन तभी होता जब हम समाज के साथ-साथ स्वयं के लिये उपयोगी और महान बनें सच्चे नागरिक और सच्चे मनुष्य बनकर ही हम कर्तव्य पालन कर सकते हैं। एक दिन किसी ने भगवान् बुद्ध से पूछा, ‘आप महान् किसलिये?’ भगवान् ने प्रत्युत्तर देते हुए कहा – ‘ मैं महान् इसलिये नहीं कि मैंने कोई विशेष सिद्धि पायी है। मैं इसलिये भी महान् नहीं हूँ जिस कारण तुम मुझे महान् मानते हो। मेरी महानता का कारण यह है कि मैंने स्वप्न में भी किसी का अहित नहीं चाहा है। किसी को भी दुःख अथवा अशान्ति नहीं पहुँचायी? सदा दुःखियों के दुःखों को जानकर, समझकर, सहानुभूतिपूर्वक आश्वासन प्रदान करने की कोशिश की है।”प्रत्येक व्यक्ति को पहले अपनी स्वजाति सुधारने का प्रयत्न करना चाहिये। जीवन के निर्माण में यथासम्भव योगदान करना चाहिये। इसी में राष्ट्र कल्याण निहित है। समाज में एक भले व्यक्ति की उत्पत्ति एक बुरे आदमी की संख्या स्वभाविक रूप से घटाती है। इसी प्रकार जब एक राष्ट्र अपने नैतिक बल पर खड़ा होता है तब पतनोन्मुख राष्ट्रों की संख्या में से एक ईकाई घट जाती है। अनेक महान् राष्ट्रों का उदय और अस्त होता है। वे आक्रमण करें तो भी अपने नैतिक बल पर दृढ़ राष्ट्र की लहराती ध्वजा को उतारने का साहस किसमें है? जो दूसरों की हत्या करते हैं, उनको भी आखिर में शान्ति प्राप्त होती ही है। वह देश सदा सुरक्षित है जहाँ सन्तों का बाहुल्य है। ऐसे देश की संस्कृति सदैव जगमगाती है। कभी हिंसात्मक देश अहिंसात्मक देश को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचा सकते। अपने देश में पुनः स्वर्ण युग आयेगा, जब प्रत्येक भारतीय जीवन योग, धर्म, आध्यात्मिकता और संन्यास परिपूर्ण होगा और हम सच्चे संन्यासी होंगे।सच्चा संन्यासी उसे कहते हैं, जिसका शरीर कर्तव्य परायण होने पर भी मन भगवद्परायण होता है। जो मन को संयत रखकर, एकाग्रतापूर्वक कर्तव्य पालन करते रहते हैं, जो स्वप्न में भी धन की कल्पना नहीं करते। वास्तविक संन्यास को साकार करने के लिये महात्माओं के उपदेशामृत का श्रवण एवं पठन-पाठन अति आवश्यक है।


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