भिलाईनगर। दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र,नागपुर और इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय,खैरागढ़ के साथ व सहयोग से आयोजित त्रिदिवसीय केबीआर बिमलार्पण संगीत महोत्सव में दूसरे दिन 9 जनवरी रविवार की शाम शास्त्रीयता में निबद्ध सधी हुई प्रस्तुतियां हुई।
भिलाई स्टील प्लांट के जीएम माइंस रहे प्रख्यात संगीतज्ञ दिवंगत आचार्य पं बिमलेंदु मुखर्जी के सांगीतिक प्रचार प्रसार एवम योगदान को याद करते हुए उनकी स्मृति में इस महोत्सव के दूसरे दिन की शुरुवात मां सरस्वती वंदना से हुई। मनाली बोस ने इस खूबसूरत बंदिश जो की राग सरस्वती में स्वरबद्ध की गई थी। जिसे उतनी ही खूबसूरती से लिखा सुस्मिता बसु मजूमदार ने। इसके बोल थे ‘मात चरणन शीश नवाऊ’ जो पंचशती नव बंदिश संगम के संग्रह से ली गई है।
इस सुमधुर शुरुआात के बाद सम्यक बंदोपाध्य के शास्त्रीय गायन के साथ कार्यक्रम आगे बढ़ा। सम्यक केबीआर संगीत प्रतियोगिता ‘संयोगिता 2021’ के विजेता रहे हैं और केबीआर परंपरानुसार विजेता को महोत्सव में अपनी प्रस्तुति करने का अवसर मिलता है।
सम्यक ने अपने गायन प्रस्तुति में राग पूरिया में विलंबित एकताल में बंदिश प्रस्तुत की जिसके बोल ‘पिया गुणवंता’ थे। तत्पश्चात द्रुत बंदिश ‘मैं तो जारी आई पिया संग रंगरलियां’ सुनाई। उनके गायन में तालीम के साथ साथ रियाज, तैयारी,ख्रुद की सोच और सौंदर्य दिखाई पड़ता है।
दूसरी प्रस्तुति में प्रतीक श्रीवास्तव ने सरोद वादन की शुरुवात राग बागेश्री में आलाप,जोड़ व झाला से की। इसके बाद दो बंदिशें इसी राग में प्रस्तुत की जो की क्रमश: झपताल एवम तीनताल में निबद्ध थी। उन्होंने बड़ी खूबसूरती के साथ राग बागेश्री प्रस्तुत किया जिसमे कलाकार की अपनी सोच चिंतन दिखाई पड़ता है। प्रतीक के साथ तबले पर प्रणय चटर्जी ने संगत की।
महोत्सव की अगली प्रस्तुति ‘संयोगिता 2021’ की उपशास्त्रीय विधा में विजेता स्वर्णाली रॉय चौधरी का गायन रहा। उन्होंने पहली ठुमरी ‘मद के भरे तोरे नैना’ से की, इसके बाद दादरा ‘हमरी अटरिया पे’ और गज़़ल ‘उल्टी हो गई सब तदबीरें’ पेश की। उन्होंने समापन ‘बाजे रे मुरलिया बाजे’ भजन से किया । उनके गायन से उनकी शास्त्रीय संगीत में तालीम और रियाज परिलक्षित होता है।
अंतिम प्रस्तुति इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के प्रो हिमांशु विश्वरूप का वायलिन वादन रही। उन्होंने शुरुवात राग झिंझोटी से की जिसमे उन्होंने विलंबित एकताल,मध्यलय तीन ताल एवम द्रुत तीन ताल में बंदिशे प्रस्तुत की। इसके बाद उन्होंने राग जोग प्रस्तुत किया। जिसमे विलंबित व द्रुत तीन ताल में बंदिशे प्रस्तुत की। हिमांशु ने राग मांड से समापन किया। रागों की शुद्धता, गांभीर्य एवम स्वयं की सांगीतिक व परिपक्व सोच उनके वादन में दिखी।