संसार का प्रत्येक जीव आस्तिक है – श्रीश्वरी देवी
00 कृपालु जी महाराज की प्रचारिका ने दिया दार्शनिक प्रवचन…

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भिलाई नगर 22 जनवरी 2023 / पावरहाउस के आई टी आई मैदान में 20 जनवरी से 3 फरवरी तक आयोजित दिव्य दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला के दूसरे दिन पंचम मूल जगद्गुरु स्वामी श्री कृपालु जी महाराज की प्रचारिका सुश्री श्रीश्वरी देवी ने बताया कि संसार का प्रत्येक जीव आस्तिक है, और अनंतानंत कोटि प्रयत्न करके भी नास्तिक नही हो सकता।

इसको सिद्ध करने के लिये उन्होंने बताया कि संसार का प्रत्येक जीव प्रतिक्षण कुछ न कुछ कर्म कर रहा है। कोई भी जीव एक क्षण को भी अकर्मा नही रह सकता। दर्शन शास्त्र कहता है-प्रयोजनमनुद्दिश्य मन्तेपि न प्रवर्तते।” अर्थात् घोर से चोर मुर्ख भी बिना प्रयोजन के कोई कार्य नहीं करता। सभी जीव अलग अलग कर्म करते हुए दिखाई देते हैं, लेकिन उनका अंतिम प्रयोजन आनंद की प्राप्ति ही होता है। इसके विज्ञान को स्पष्ट करते हुए उन्होने बताया कि – आनंद और भगवान पर्यायवाची है और हम जीत भगवान के अंश है। प्रकृति का नियम है कि हर अंश अपने अंशी से ही सभावतः प्यार करता है। इसीलिये प्रत्येक जीव भी अपने अंशी भगवान अर्थात आनंद से प्यार करता है और उसे पाने के लिये प्रतिक्षण प्रयत्न कर रह है। लेकिन उसे यह नहीं मालूम कि आनंद याने भगवान् क्या होता है, इसलिये वह गलत दिशा में भाग रहा है और निरन्तर दुःखी है। वेद की कथा का उल्लेख करते हुए देवी जी ने बताया कि वरुण के पुत्र भृगु ने अपने ब्रह्मज्ञानी पिता से पूछा कि -पिताजी ब्रझ किसे कहते हैं? तब वरुण ने बताया कि-‘यती वा इमानि भूतानि जायन्ते


येन जातानि जीवन्ति यत् प्रयत्यभिशतिनन्ति तर ब्रा विजिध्यासस्त’ अर्थात जिससे यह संसार उत्पन्न होता है, जिसमे यह संसार स्थित है, और जिसमें इसका लय होता है, उसे जहां कहते 21 अर्थात् भगवान कहते हैं। इस पर मृत्यु ने पुनः प्रश्न किया कि-पिता जी किससे वह संसार उत्पन्न हुआ है? किसमें स्थित है ? और किसमें इसका लय होता है? तब करुण ने कहा कि – यह शब्दों का विषय नहीं हैं। – उसे अनुभव द्वारा जानने के लिये जाओ तपस्या करो’ भृगु तपस्या करने गया और गलत उत्तर लेकर बार चार आया और पुन पुन, तपस्या करने गया। अन्त में आकर उसने बताया कि-आनंदी ब्रहोति व्यजानात् आनंदादयेव खल्लिमानी भूतानि जायन्ते आनंदेन जातानि जीवन्ति आनंद प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति अर्थात् आनंद, 9 ही ब्रह्म है। उसी से यह संसार उत्पन्न हुआ है। उसी में स्थित है और उसी में इसका लय होता है। प्रवचन प्रारंभ होने के पूर्व एवं पश्चात देवी जी ने मधुर संकीर्तनों के द्वारा लोगों ने रस प्राप्त किया।


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