सुरक्षा से समझौता, समाज के लिए खतरे की घंटी: मॉल में अपराधी बना गार्ड, पुलिस से भी की गुंडागर्दी , सुरक्षा गार्ड के भेस मे निकला अपराधी, पुलिस ने दबोचा… - Steel City Online News Portal

सुरक्षा से समझौता, समाज के लिए खतरे की घंटी: मॉल में अपराधी बना गार्ड, पुलिस से भी की गुंडागर्दी , सुरक्षा गार्ड के भेस मे निकला अपराधी, पुलिस ने दबोचा…

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सुरक्षा पर समझौता, समाज के लिए खतरे की घंटी: मॉल में अपराधी बना गार्ड, पुलिस से भी की गुंडागर्दी , सुरक्षा गार्ड के भेस मे निकला अपराधी, पुलिस ने दबोचा…

नामजिस जगह रोज़ाना हजारों लोग अपने परिवारों के साथ पहुंचते हैं,
वहीं बिना चरित्र सत्यापन के आपराधिक रिकॉर्ड वाले व्यक्ति को सुरक्षा गार्ड के रूप में नियुक्त किया गया था।
जो सुरक्षा गार्ड की वर्दी में तैनात पाया गया। यह गार्ड न केवल आम नागरिकों से, बल्कि ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों से भी उलझ गया। यह कोई मामूली लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम की उस खतरनाक चूक का उदाहरण है, जो जनता की सुरक्षा को जोखिम में डालती है।

पुलिस ने समय रहते कार्रवाई कर आरोपी को गिरफ्तार किया, यह कदम सराहनीय है। लेकिन सवाल इससे भी बड़ा है — बिना चरित्र सत्यापन के अपराधी को सार्वजनिक स्थल पर नियुक्त करने वाली एजेंसी की जवाबदेही तय कौन करेगा?
जब सुरक्षा की जिम्मेदारी मुनाफे की होड़ में बांटी जाने लगे, तो फिर भरोसे की दीवारें खुद-ब-खुद दरकने लगती हैं।

बिलासपुर। मैग्नेटो मॉल में बिना चरित्र सत्यापन के आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को सुरक्षा गार्ड के रूप में नियुक्त किया जाना केवल एक लापरवाही नहीं, बल्कि एक गंभीर प्रणालीगत विफलता है। सुरक्षा व्यवस्था का पूरा तंत्र तभी भरोसेमंद बनता है, जब उसमें शामिल हर व्यक्ति की पृष्ठभूमि साफ और विश्वसनीय हो। लेकिन जब हत्या के प्रयास जैसे मामलों में आरोपी व्यक्ति को गार्ड की वर्दी पहनाकर सार्वजनिक स्थल की जिम्मेदारी दी जाती है, तब यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हम अपनी सुरक्षा को मज़ाक बना चुके हैं?

इस घटना में न केवल गार्ड का आचरण निंदनीय है, बल्कि उससे भी बड़ी चिंता की बात है कि कंपनी की लापरवाही। बीआईएस जैसी सुरक्षा एजेंसी ने बिना पुलिस सत्यापन के नियुक्ति की, जिससे न केवल नियमों की अवहेलना हुई, बल्कि हजारों आगंतुकों की सुरक्षा जोखिम में पड़ गई। यह स्पष्ट करता है कि कुछ कंपनियां सिर्फ अनुबंध पाने के लिए मानक प्रक्रियाओं को दरकिनार कर रही हैं।

पुलिस ने समय रहते हस्तक्षेप कर कार्रवाई की, यह सराहनीय है। लेकिन यह भी जरूरी है कि अब केवल आरोपी की गिरफ्तारी तक मामला सीमित न रहे। प्रशासन को सुरक्षा एजेंसियों के चरित्र सत्यापन रिकॉर्ड की व्यापक जांच करनी चाहिए। मॉल और बड़े प्रतिष्ठानों को भी अपनी जिम्मेदारी तय करनी होगी। सुरक्षा सिर्फ तैनाती का नाम नहीं, यह भरोसे की बुनियाद है।

आज सवाल एक गार्ड का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की साख का है। अगर इस तरह की लापरवाहियां बिना सख्त जवाबदेही के चलती रहीं, तो कल कोई भी अपराधी किसी भी जगह “सुरक्षा” का ठेका संभाल लेगा।

अब वक्त है कि जिम्मेदार एजेंसियों और प्रशासन दोनों को यह समझना होगा कि सुरक्षा की चूक सिर्फ गलती नहीं, अपराध है।

असल में मैग्नेटो मॉल में सुरक्षा व्यवस्था की बड़ी चूक सामने आई है। बिना चरित्र सत्यापन के आपराधिक रिकार्ड वाले व्यक्ति को गार्ड नियुक्त कर दिया गया। यह गार्ड न केवल आम नागरिकों से, बल्कि ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों से भी उलझ गया। इस मामले के तूल पकड़ते ही सिविल लाइन पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की है।

सीएसपी निमितेष सिंह ने बताया कि चार अक्टूबर को पुलिस कर्मी विभागीय काम से मैग्नेटो मॉल पहुंचे थे। पुलिस वाहन को ड्राइवर पार्किंग में खड़ा कर रहा था तभी गार्ड जीवन कुमार डहरिया ने उससे बहस शुरू कर दी। विरोध करने पर उसने गनमैन और अन्य पुलिसकर्मियों से भी हुज्जतबाजी की। सूचना मिलते ही सिविल लाइन पुलिस मौके पर पहुंची और गार्ड को थाने बुलाया गया।

जांच में पता चला कि उक्त गार्ड को बीआईएस कंपनी ने नियुक्त किया था, लेकिन उसका चरित्र सत्यापन नहीं कराया गया था। पुलिस ने जब उसका रिकॉर्ड खंगाला तो खुलासा हुआ कि आरोपी के खिलाफ बिल्हा थाने में हत्या के प्रयास समेत तीन आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं।

इधर, अपनी गलती छिपाने के लिए गार्ड ने पूरी घटना का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया और पुलिस पर झूठे आरोप लगाए। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की है। वहीं, बिना सत्यापन भर्ती करने वाली सुरक्षा एजेंसी की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।

बी.आई.एस. सिक्योरिटी सर्विसेज द्वारा बिना चरित्र सत्यापन के जीवन कुमार डहरिया को गार्ड के रूप में नियुक्त करना यह दर्शाता है कि कई निजी सुरक्षा एजेंसियाँ केवल अनुबंध और मुनाफे के पीछे नियमों को ताक पर रख देती हैं। और यही लापरवाही आम नागरिकों की सुरक्षा को सबसे बड़े खतरे में डालती है।

घटना के दौरान पुलिसकर्मियों से हुज्जतबाजी और बाद में सोशल मीडिया पर झूठा वीडियो प्रसारित करना, आरोपी के आपराधिक मनोवृत्ति को उजागर करता है। ऐसे मामलों में केवल आरोपी पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। प्रशासन को उन एजेंसियों पर भी सख्त दंडात्मक कार्रवाई करनी चाहिए, जिन्होंने बिना सत्यापन ऐसे लोगों को जिम्मेदारी सौंप दी।

सुरक्षा केवल दीवारों या कैमरों से नहीं, बल्कि विश्वसनीय मानव संसाधन से बनती है। यदि यह भरोसा ही कमजोर पड़ जाए, तो किसी भी व्यवस्था की नींव हिल जाती है। बिलासपुर की यह घटना चेतावनी है कि अब वक्त आ गया है कि सुरक्षा में लापरवाही को अपराध की श्रेणी में माना जाए।

जिस व्यक्ति के खिलाफ हत्या के प्रयास और अन्य गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हों, वही जब सुरक्षा गार्ड की वर्दी पहनकर सार्वजनिक स्थल पर तैनात हो जाता है, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि सिस्टम की चूक का जीता-जागता उदाहरण है।

अब वक्त है कि ऐसी लापरवाह एजेंसियों को केवल नोटिस नहीं, सजा का डर महसूस हो। क्योंकि सुरक्षा सिर्फ तैनाती नहीं, विश्वास की जिम्मेदारी है — और इसमें जरा-सी ढिलाई भी समाज के लिए खतरे की घंटी बन सकती है।


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