वेदी पूजन कर बताया भागवत कथा का महात्म्य, सेक्टर 2 श्रीरामभद्र सेवा मंडल में श्रीमद्भागवत भागवत ज्ञान सप्ताह शुरू
मनोरंजन नहीं, आत्मरंजन का है माध्यम

महिलाएं ही कलश धारण करने की अधिकारी, उसमें तीन देवियों का पुण्य-प्रताप,
सेक्टर 2 श्रीरामभद्र सेवा मंडल में श्रीमद्भागवत भागवत ज्ञान सप्ताह शुरू
भिलाई नगर 09 जनवरी 2026:- सम्प्रति सेवा समिति और प्रेम नरायण समिति के तत्वावधान में श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह का आयोजन 9 जनवरी सवरी तक दोपहर 1 बजे से 5 बजे तक श्रीरामभद्र सेवा मंडल सेक्टर 2 में आचार्य संदीप तिवारी फतेहपुर वाले द्वारा सर्वजन कल्याणार्थ के उद्देश्य से किया गया है। जिसके प्रथम दिवस शुक्रवार को व्यासपीठ से कथावाचक ने भागवत कथा के महात्म्य, अर्थ, भक्ति चरित्र और धुंधकारी के कथा की व्याख्या की। सात ही महिलाओं को ही कलश उठाने का अधिकार है पुरुषों को नही के संदर्भ में भी बताया।
पहले दिन कथा की शुरुआत करते हुए कथावाचक ने कहा कि राम कृपा बिनु सुलभ न सोई, बिनु सत्संग विवेक न होई, यानी जब तक मानव के जीवन में प्रभु राम की कृपा नही होती तब तक हम किसी कथा में नही जा सकते व सत्संग का लाभ नही ले सकते है। सेक्टर 2 में चल रहे श्रीमद् भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ सप्ताह श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण वातावरण में शुभारंभ हुआ। प्रथम दिवस शुक्रवार को प्रातः वेदी पूजा एवं कलश यात्रा के साथ इस दिव्य आयोजन की शुरुआत हुई। जहां संपूर्ण वातावरण भक्तिरस में सराबोर हो उठा। आयोजन में दिवंगतो की स्मृति में 7 पोथी परिवार जनों दव्ारा बैठाई गई है।


कलश में तीन देवीयों का पुण्य-प्रताप,,,,,
भागवताचार्य संदीप तिवारी ने भागवात कथा की शुरुआत करते हुए महिलाओं दव्ारा ही कलश धारण करने की महिमा बताई। उन्होंने कलश की व्याख्या करते हुए महिलाओं को बेहद ऊर्जावान व सशक्त बताते हुए कहा कि कलश तीन शब्दों से बना है। कलश में क से काली, ल से लक्ष्मी व स से माता सरस्वती का वास होता है। यह तीनों माताओं के तेज को सिर पर उठाने जैसा महान कार्य केवल महिलाएं ही कर सकती है। साथ ही कलश में जल के देवता वरुण का निवास होता है। इसलिए कलश उठाने की अधिकारी केवल महिलाएं ही मानी गई है।


वैदिक मंत्रोउच्चार से हुई वेदी स्थापना,,,,,,
कथा के प्रथम दिवस विद्वान पंडितों द्वारा सुबह 11 बजे से पूरे विधि-विधान से मंत्रोच्चार के साथ यजमानों ने कलश यात्रा और बेदी स्थापना कर पूजन किया। मुख्य यजमानों की उपस्थिति में दोपहर 1 बजे श्रीमद्भागवत कथा की शुरुआत आचार्य पंडित संदीप तिवारी ने भागवत जी की आरती कर किया गया। इस दौरान उन्होंने श्रीमद्भागवत कथा कब, क्यों, कैसे व उसके फल का महात्म्य व कलश के संदर्भ में विस्तार से व्याखाया की।


भागवत कथा और बताया महात्मय
श्रीराम भद्र सेवा मंडल सेक्टर 2 के प्रांगण में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह के पहले दिन कथावाचक आचार्य पंडित संदीप तिवारी ने श्रीमद्भागवत कथा के महात्म्य का सप्रसंग विस्तार से व्याख्यान करते हुए कहा कि भागवत चार शब्दों से बना है जिसका अर्थ है कि भागवत कथा सुनने से भ से भाग्य खुल जाते है, ग से गुमान ( अहंकार) घट जाता है व से वल व बुद्धी बढ़ जाती है एवं त से तकदीर खुल जाती है। वेद रुपी वृक्ष का फल ही भागवत कथा है इसलिए प्रत्येक सनातनी व्यक्ति को भागवत कथा अवश्य ही सुननी चाहिए। माता भक्ति एवं उनके दो पुत्र ज्ञान व वैराग्य के बारे में बताया।
आज होगी इनकी व्याख्या:
आचार्य पं संदीप तिवारी ने बताया कि कथा के द्वितीय दिवस मंगलाचरण, श्री सुकदेव अवतार, परीक्षित जन्म, सृष्टी विस्तार, हिरण्याक्ष वध, राजा परिक्षित जन्म, कपिल अवतार आदि प्रसंगों का विस्तार पूर्वक व्याख्या की जाएगी।
प्रथम दिन गोकर्ण कथा ही क्यों,,,,,
आचार्य ने मोक्षदायिनी श्रीकृष्ण कथा का अमृतपान कराते हुए गोकर्ण प्रसंग के माध्यम से भागवत महात्म्य को सहज एवं प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि प्रथम दिन की कथा को गोकर्ण कथा कहा जाता है, किंतु उसका मूल भाव धुंधकारी के उद्धार से जुड़ा है। पाप की चर्चा सुनने से पाप का अंश लगने की शंका के कारण इसे गोकर्ण कथा के रूप में श्रवण कराया जाता है। गोकर्ण जी ने भागवत कथा के माध्यम से अपने पापी भाई धुंधकारी का उद्धार किया, जिससे यह सिद्ध होता है कि भागवत कथा सुनने मात्र से भी पाप नष्ट होते हैं और जीवन का कल्याण होता है।
श्रद्धापूर्वक किया गया श्रवण ही पूर्ण फल देता है,,,,
गयाजी में श्राद्ध के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि गया जाकर पिंडदान करना श्रेष्ठ है, किंतु पितरों से पिंड छुड़ाने का भाव नहीं रखना चाहिए। गया से लौटने के बाद भी श्राद्ध–तर्पण किया जा सकता है। गोकर्ण जी ने गया में माता–पिता एवं भाई धुंधकारी का श्राद्ध किया, माता–पिता की मुक्ति हुई, किंतु धुंधकारी के विशेष पापों के कारण उसके लिए भागवत कथा का आयोजन करना पड़ा। इससे यह संदेश मिलता है कि श्रवण में भी भेद होता है और श्रद्धापूर्वक किया गया श्रवण ही पूर्ण फल देता है।




